Wednesday, October 29, 2008

''गुब्बारा और आदमी''

आज आम आदमी भी गुब्बारे की तरह ,
अन्दर अजीब सि गुब्बार लेकर बैठा है .....!

शर्म ही नचा रही है जिंदगी शायद , वर्ना
बहुत हलकी सी दीवार सजा कर बैठा है ...!

आज खामोशी है हमारे चारोतरफ मगर ,
आवाज एक भविष्य की फीजा मे छुपाकर बैठा है.!

जो रोकती है मुझे जीने से, ये जिंदगी उस की है ,
जाने किन -२ रिश्तो मैं खुदको फशा कर बैठा है !

समां मिलती नहीं और जमी हमें भाती नहीं ,
जाने क्या नविस्ता हाथो मे लिखाकर बैठा है ....!

कोई देख ना ले "मधुर"-रंग -हवा -ए-हुस्शन ,
जाने कैशे-२ रंग दिल मे छुपाकर बैठा है ..........!

आज आम आदमी भी गुब्बारे की तरह ,
अन्दर अजीब सि गुब्बार लेकर बैठा है .............!

मधुकर(मधुर)

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