आज आम आदमी भी गुब्बारे की तरह ,
अन्दर अजीब सि गुब्बार लेकर बैठा है .....!
शर्म ही नचा रही है जिंदगी शायद , वर्ना
बहुत हलकी सी दीवार सजा कर बैठा है ...!
आज खामोशी है हमारे चारोतरफ मगर ,
आवाज एक भविष्य की फीजा मे छुपाकर बैठा है.!
जो रोकती है मुझे जीने से, ये जिंदगी उस की है ,
जाने किन -२ रिश्तो मैं खुदको फशा कर बैठा है !
समां मिलती नहीं और जमी हमें भाती नहीं ,
जाने क्या नविस्ता हाथो मे लिखाकर बैठा है ....!
कोई देख ना ले "मधुर"-रंग -हवा -ए-हुस्शन ,
जाने कैशे-२ रंग दिल मे छुपाकर बैठा है ..........!
आज आम आदमी भी गुब्बारे की तरह ,
अन्दर अजीब सि गुब्बार लेकर बैठा है .............!
मधुकर(मधुर)
Wednesday, October 29, 2008
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